दूसरी स्थिति -सूर्य नमस्कार की दूसरी स्थिति में विशुद्धि चक्र के प्रभावित होने से आकाश तत्व की प्राप्ति होती है ।फेफड़ों में वायु रोकने की क्षमता बढ़ती है ।प्राण मजबूत होता है।
विधि-1. स्वास भरते हुए दोनों भुजाएं ऊपर भुजाएं कानों के साथ सीधी रखें।
विधि-1. स्वास भरते हुए दोनों भुजाएं ऊपर भुजाएं कानों के साथ सीधी रखें।
2. दोनों भुजाएं गर्दन सहित पीछे, गर्दन कंठ कूप में।
3.ध्यान पूरा विशुद्धि चक्र पर( कंठ के पीछे रीढ़ पर)।
सूर्य नमस्कार करते हुए ध्यान देनयोग्य बातें - भुजाएं ऊपर लाते हुए प्राय कंधों के बराबर समानांतर नहीं रहती, दूरियां निकट हो जाती है ,कलाइयां मुड़ जाती हैं ,अंगुलियां में अंगूठे खुल जाते हैं ,हथेलियां सामने की ओर ना होकर तिरछी हो जाती हैं, यह सब स्थितियां ठीक करें ,इससे भी आवश्यक यह बात है कि गर्दन सहित भुजाएं पीछे न जाकर या तो गर्दन पहले पीछे चली जाती है या भुजाएं इस स्थिति को प्रयास पूर्वक ठीक करें।
3.ध्यान पूरा विशुद्धि चक्र पर( कंठ के पीछे रीढ़ पर)।
सूर्य नमस्कार करते हुए ध्यान देनयोग्य बातें - भुजाएं ऊपर लाते हुए प्राय कंधों के बराबर समानांतर नहीं रहती, दूरियां निकट हो जाती है ,कलाइयां मुड़ जाती हैं ,अंगुलियां में अंगूठे खुल जाते हैं ,हथेलियां सामने की ओर ना होकर तिरछी हो जाती हैं, यह सब स्थितियां ठीक करें ,इससे भी आवश्यक यह बात है कि गर्दन सहित भुजाएं पीछे न जाकर या तो गर्दन पहले पीछे चली जाती है या भुजाएं इस स्थिति को प्रयास पूर्वक ठीक करें।
लाभ-1. भुजाएं गर्दन सहित पीछे ले जाने से स्वर तंत्रीकाएं प्रभावित होती है।
2.रीढ़ का सर्वाइकल भाग फेफड़े हाथ कंधे स्वर तंत्रीकाएं गले की मांसपेशियां , थायराइड,पैरा- थायराइड,विशद्धि चक्र, मस्तिष्क के अवयव सभी प्रभावित होते हैं।
3. मस्तिष्क और रीढ़ के जोड़ सक्रिय होते हैं।
4.सर्वाइकल भाग के सभी दोष दूर होते हैं |
5.फेफड़ों में श्वास लेने की क्षमता अधिक होती है।
6.आकाश तत्व का निर्माण होता है।
2.रीढ़ का सर्वाइकल भाग फेफड़े हाथ कंधे स्वर तंत्रीकाएं गले की मांसपेशियां , थायराइड,पैरा- थायराइड,विशद्धि चक्र, मस्तिष्क के अवयव सभी प्रभावित होते हैं।
3. मस्तिष्क और रीढ़ के जोड़ सक्रिय होते हैं।
4.सर्वाइकल भाग के सभी दोष दूर होते हैं |
5.फेफड़ों में श्वास लेने की क्षमता अधिक होती है।
6.आकाश तत्व का निर्माण होता है।
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