चौथी स्थिति -1. इस स्थिति में दाये पैर को श्वास भरते हुए अधिक से अधिक पीछे की ओर ले जायें |
पंजा खड़ा , घुटना पृथ्वी से थोड़ा ऊपर रखें |
2. कमर नीचे और छाती आगे की ओर हो |
3.गर्दन पीछे की ओर |
4. अंगुलियाँ एवं अंगूठे मिले ,हथेलियाँ पृथ्वी पर रखी हो |
5. बाया पैर दोनों हथेलियों के बीच में रखा हो |
6. ध्यान स्वाधिष्ठान चक्र पर रहे |
लाभ -1. रीढ़ के निचले भाग पर तथा फेफड़ो पर विशेषतः प्रभाव आने से पाचन एवं श्वसन प्रणालियाँ सुदढ़ बनती है |
2. अमाशय ,आंतें ,पेट के सभी अंग ,रीढ़ ,गर्दन की मांसपेशिया ,कंधे एवं फेफड़े मजबूत होते है |
3. जिगर ,तिल्ली ,अमाशय ,मूत्र नली ,गर्भाशय ,आदि के दोष समाप्त होते है|
4. हर्निया के रोग में लाभ होता है |
5. रीढ़ के दोष समाप्त होते हैं |
6. फेफड़े स्वस्थ होते हैं |
7. रक्त भ्रमण सुचारु रूप से होता हैं |
नोट -ध्यान रहें हथेलियाँ पंजे एक बार रखने पर खिसकाए नहीं |
यदि आपके मन में कोई प्रश्न है तो हमें जरूर बताए या हमें सीधे -सीधे मेल करें और रोज़ाना योगा ब्लिस पेज पर लिखना यन भूले |
Mail-Id= kavitamukesh1973@gmail.com
Phone Number= 8459444497
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3.गर्दन पीछे की ओर |
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5. बाया पैर दोनों हथेलियों के बीच में रखा हो |
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2. अमाशय ,आंतें ,पेट के सभी अंग ,रीढ़ ,गर्दन की मांसपेशिया ,कंधे एवं फेफड़े मजबूत होते है |
3. जिगर ,तिल्ली ,अमाशय ,मूत्र नली ,गर्भाशय ,आदि के दोष समाप्त होते है|
4. हर्निया के रोग में लाभ होता है |
5. रीढ़ के दोष समाप्त होते हैं |
6. फेफड़े स्वस्थ होते हैं |
7. रक्त भ्रमण सुचारु रूप से होता हैं |
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